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श्लोक 7.10.31-32  |
या या मे जायते बुद्धिर्येषु येष्वाश्रमेषु च॥ ३१॥
सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं धर्मं च पालये।
एष मे परमोदारो वर: परमको मत:॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| मैं जिस किसी आश्रम के विषय में जो कुछ विचार करूँ, वह धर्म के अनुकूल हो और मैं उसी धर्म का पालन करूँ; यही मेरे लिए सर्वोत्तम एवं परम वांछनीय वर है ॥31-32॥ |
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| Whatever thought I have about any ashrama, let it be in accordance with the Dharma and let me follow that Dharma; this is the best and most desirable boon for me. ॥ 3 1-32॥ |
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