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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.10.2 
अगस्त्यस्त्वब्रवीत् तत्र रामं सुप्रीतमानसम्।
तांस्तान् धर्मविधींस्तत्र भ्रातरस्ते समाविशन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
तब अगस्त्यजी ने अत्यंत प्रसन्न मन से श्री राम से कहा - 'रघुनन्दन! उन तीनों भाइयों ने वहाँ भिन्न-भिन्न अनुष्ठान किये॥2॥
 
Then Agastyaji said to Shri Ram with a very happy mind - 'Raghunandan! Those three brothers performed different rituals there. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)