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श्लोक 7.10.14  |
शीघ्रं वरय धर्मज्ञ वरो यस्तेऽभिकांक्षित:।
कं ते कामं करोम्यद्य न वृथा ते परिश्रम:॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| हे धर्म के ज्ञाता! शीघ्र ही अपना इच्छित वर मांग लो। बताओ, आज मैं तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ? तुम्हारा प्रयास व्यर्थ न जाए।॥14॥ |
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| O knower of Dharma! Ask for the boon you desire quickly. Tell me, which of your wishes should I fulfill today? Your efforts should not go in vain.'॥ 14॥ |
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