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श्लोक  6.99.35 
रौद्रचापप्रयुक्तां तां नीलोत्पलदलप्रभाम्।
शिरसाधारयद् रामो न व्यथामभ्यपद्यत॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
भयानक धनुष से छूटी हुई, नीले कमल के पत्ते के समान चमकती हुई, उस बाणमाला को भगवान राम ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया, किन्तु वे व्याकुल नहीं हुए।
 
That garland of arrows released from the dreadful bow and shining with dark radiance like a blue lotus leaf, was worn by Lord Rama on his head but he was not distressed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)