|
| |
| |
श्लोक 6.98.26  |
अथेन्द्रशत्रुस्त्रिदशालयानां
वनौकसां चैव महाप्रणादम्।
श्रुत्वा सरोषं युधि राक्षसेन्द्र:
पुनश्च युद्धाभिमुखोऽवतस्थे॥ २६॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| युद्धस्थल में देवताओं और वानरों की घोर गर्जना सुनकर इन्द्र का शत्रु राक्षसराज रावण पुनः युद्ध के लिए आतुर होकर क्रोध में आकर वहाँ खड़ा हो गया। |
| |
| Hearing the loud roar of the gods and the monkeys on the battlefield, the enemy of Indra, the demon king Ravana, stood there again in anger, eager for battle. |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टनवतितम: सर्ग: ॥ ९ ८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ८॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|