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श्लोक 6.95.40  |
ते तु हृष्टाभिनर्दन्तो भिन्दन्त इव मेदिनीम्।
नादं घोरं विमुञ्चन्तो निर्ययुर्जयकाङ्क्षिण:॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| वे खुशी से ऐसे दहाड़ रहे थे मानो धरती फाड़ डालेंगे। अपने हृदय में विजय की अभिलाषा लिए वे जोर-जोर से दहाड़ते हुए नगर से बाहर निकले। |
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| They were roaring with joy as if they would tear the earth apart. With the desire of victory in their hearts, they came out of the city roaring loudly. |
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