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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 92: रावण का शोक तथा सुपार्श्व के समझाने से उसका सीता-वध से निवृत्त होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.92.17 
प्रकृत्या कोपनं ह्येनं पुत्रस्य पुनराधय:।
दीप्तं संदीपयामासुर्घर्मेऽर्कमिव रश्मय:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
एक तो वह स्वभाव से ही गुस्सैल स्वभाव के थे। दूसरे, बेटे की चिंता उन्हें और भी बेचैन कर देती थी - उन्हें और भी बेचैन कर देती थी, ठीक वैसे ही जैसे गर्मी के मौसम में सूरज की किरणें उन्हें और भी उग्र बना देती हैं।
 
Firstly, he was short-tempered by nature. Secondly, the worries for his son made him more agitated – made him more agitated, just as the rays of the sun make him more fierce in the summer season.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)