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श्लोक 6.88.77  |
अथ समरपरिश्रमं निहन्तुं
समरमुखेष्वजितस्य लक्ष्मणस्य।
प्रियहितमुपपादयन् महात्मा
समरमुपेत्य विभीषणोऽवतस्थे॥ ७७॥ |
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| अनुवाद |
| युद्धभूमि में पराजित न हुए लक्ष्मण को युद्ध के कारण उत्पन्न हुए श्रम से मुक्त करने तथा अपने प्रियतम का कल्याण करने के लिए महात्मा विभीषण युद्धभूमि में आकर खड़े हो गए ॥77॥ |
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| Mahatma Vibhishana came and stood on the battlefield to relieve Lakshmana, who was not defeated on the battlefield, from his labor caused by war and to look after his beloved and welfare. 77॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टाशीतितम: सर्ग: ॥ ८ ८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ८॥ |
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