श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 88: लक्ष्मण और इन्द्रजित की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  6.88.64 
व्यपेतदोषमस्यन्तौ लघु चित्रं च सुष्ठु च।
उभौ तु तुमुलं घोरं चक्रतुर्नरराक्षसौ॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
दोनों वीर और राक्षस बड़ी फुर्ती और अद्भुत तथा सुन्दर ढंग से बाण चला रहे थे। उनकी बाण चलाने की कला में कोई दोष नहीं था। दोनों में भयंकर युद्ध चल रहा था।
 
Both the brave men and the demons were shooting arrows with great agility and in a wonderful and beautiful manner. There was no flaw in their art of shooting arrows. Both of them were fighting a fierce battle.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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