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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 88: लक्ष्मण और इन्द्रजित की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  6.88.43 
उपलभ्य मुहूर्तेन संज्ञां प्रत्यागतेन्द्रिय:।
ददर्शावस्थितं वीरमाजौ दशरथात्मजम्।
सोऽभिचक्राम सौमित्रिं रोषात् संरक्तलोचन:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया और उनकी इंद्रियाँ स्थिर हुईं, तो उन्होंने दशरथ के वीर पुत्र लक्ष्मण को युद्धभूमि में खड़े देखा। उन्हें देखते ही उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गईं और वे सुमित्रा के पुत्र के सामने गए।
 
After a while when he regained consciousness and his senses became stable, he saw the brave son of Dasharath, Lakshman standing on the battlefield. On seeing him, his eyes became red with anger and he went in front of Sumitra's son.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)