श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 88: लक्ष्मण और इन्द्रजित की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  6.88.41 
तत: संधाय सौमित्रि: शरानाशीविषोपमान्।
मुमोच विशिखांस्तस्मिन् सर्पानिव विषोल्बणान्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तब सुमित्रापुत्र ने अपने धनुष पर विषैले सर्पों के समान भयंकर बाण चढ़ाकर इन्द्रजित पर चलाये। वे बाण अत्यंत विषैले सर्प थे।
 
Then Sumitra's son mounted dreadful arrows like poisonous snakes on his bow and shot them at Indrajit. Those arrows were extremely poisonous snakes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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