श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 88: लक्ष्मण और इन्द्रजित की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  6.88.37 
तत: शरान् दाशरथि: संधायामित्रकर्षण:।
ससर्ज राक्षसेन्द्राय क्रुद्ध: सर्प इव श्वसन्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् दशरथनन्दन शत्रुसूदन लक्ष्मण ने क्रोधित सर्प के समान गहरी साँस लेकर अपने धनुष पर बहुत से बाण चढ़ाकर राक्षसराज इन्द्रजित पर उन्हें छोड़ दिया॥37॥
 
Thereafter Dashrathanandan Shatrusudan Lakshmana, like an angry snake, took a deep breath and placed many arrows on his bow and shot them all at the demon king Indrajit. 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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