श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 88: लक्ष्मण और इन्द्रजित की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.88.17 
एवमुक्तो धनुर्भीमं परामृश्य महाबल:।
ससर्ज निशितान् बाणानिन्द्रजित् समितिंजय:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण की यह बात सुनकर युद्ध में विजयी हुए महाबली इन्द्रजित् ने अपने भयंकर धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़कर तीखे बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी॥17॥
 
On hearing this from Lakshmana, the mighty Indrajit, victorious in the battle, holding his fierce bow firmly, started raining sharp arrows. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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