श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 88: लक्ष्मण और इन्द्रजित की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.88.14 
स त्वमर्थस्य हीनार्थो दुरवापस्य केनचित्।
वाचा व्याहृत्य जानीषे कृतार्थोऽस्मीति दुर्मते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'दुमते! तुम अपना इच्छित कार्य करने में असमर्थ हो। जो कार्य किसी के लिए भी कठिन है, उसे केवल शब्दों से कहकर तुम अपने को सिद्ध समझ रहे हो!॥14॥
 
‘Dummate! You are incapable of accomplishing your desired task. You are considering yourself accomplished by merely saying through words that which is difficult to be accomplished by anyone!॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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