श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 86: वानरों और राक्षसों का युद्ध, हनुमान्जी के द्वारा राक्षस सेना का संहार और उनका इन्द्रजित को द्वन्द्वयुद्ध के लिये ललकारना तथा लक्ष्मण का उसे देखना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.86.4 
स त्वमिन्द्राशनिप्रख्यै: शरैरवकिरन् परान्।
अभिद्रवाशु यावद् वै नैतत् कर्म समाप्यते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
‘इसलिए इस हवन-अनुष्ठान के पूर्ण होने से पहले ही तुम शत्रुओं पर वज्र के समान बाणों की वर्षा करके शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करो।॥4॥
 
‘Therefore, even before the completion of this havan ceremony, you should quickly attack the enemies by showering arrows like thunderbolts. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)