श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 85: विभीषण के अनुरोध से श्रीरामचन्द्रजी का लक्ष्मण को इन्द्रजित के वध के लिये जाने की आज्ञा देना और सेना सहित लक्ष्मण का निकुम्भिला-मन्दिर के पास पहुँचना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.85.17 
विभीषणवच: श्रुत्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत्।
जानामि तस्य रौद्रस्य मायां सत्यपराक्रम॥ १७॥
 
 
अनुवाद
विभीषण के वचन सुनकर श्री रामचन्द्र जी शोक त्यागकर बोले- 'सचमुच वीर विभीषण! मैं उस भयानक राक्षस की माया को जानता हूँ॥17॥
 
Hearing the words of Vibhishan, Shri Ramchandra ji gave up his grief and said – ‘Truly brave Vibhishan! I know the illusions of that terrible demon. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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