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श्लोक 6.85.17  |
विभीषणवच: श्रुत्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत्।
जानामि तस्य रौद्रस्य मायां सत्यपराक्रम॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| विभीषण के वचन सुनकर श्री रामचन्द्र जी शोक त्यागकर बोले- 'सचमुच वीर विभीषण! मैं उस भयानक राक्षस की माया को जानता हूँ॥17॥ |
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| Hearing the words of Vibhishan, Shri Ramchandra ji gave up his grief and said – ‘Truly brave Vibhishan! I know the illusions of that terrible demon. 17॥ |
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