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श्लोक 6.82.28  |
अथेन्द्रजिद् राक्षसभूतये तु
जुहाव हव्यं विधिना विधानवित्।
दृष्ट्वा व्यतिष्ठन्त च राक्षसास्ते
महासमूहेषु नयानयज्ञा:॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| इन्द्रजित यज्ञ के कर्मकाण्ड के ज्ञाता थे । उन्होंने समस्त राक्षसों के नाश के लिए हवन का अनुष्ठान आरम्भ किया । उस हवन को देखकर महायुद्ध के अवसर पर विधि-विधान जानने वाले राक्षस उठ खड़े हुए । 28॥ |
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| Indrajit was knowledgeable about the rituals of Yagya. He started performing ritualistic havan for the eradication of all the demons. Seeing that Homa, the demons who knew the rules and regulations on the occasion of the great war stood up. 28॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वॺशीतितम: सर्ग: ॥ ८ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ २॥ |
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