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श्लोक  6.76.45 
संधाय चान्यं सुमुखं शरमाशीविषोपमम्।
आजघान महातेजा वक्षसि द्विविदाग्रजम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
फिर उसने धनुष पर एक और बाण चढ़ाया, जिसकी नोक विषैले सर्प के समान भयंकर और सुन्दर थी, और उससे उस अत्यन्त बलवान योद्धा ने अपने बड़े भाई द्विविद की छाती पर गहरा घाव कर दिया।
 
Then he placed another arrow on the bow, having a fearsome and beautiful tip like that of a poisonous serpent, and with it that extremely powerful warrior inflicted a deep wound on the chest of Dwivid's elder brother.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)