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ramayan 6.75.45: वह जिस प्रकार दण्ड के द्वारा अपने अंगों को चलाता था, उससे दसों दिशाएँ व्याकुल हो जाती थीं। वह कालरुद्र के अंगों में प्रकट हुए क्रोध के स्वरूप के समान प्रतीत होने लगा था ॥45॥   |   ramayan सर्ग 6.75: लङ्कापुरी का दहन तथा राक्षसों और वानरों का भयंकर युद्ध   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 75: लङ्कापुरी का दहन तथा राक्षसों और वानरों का भयंकर युद्ध  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  6.75.45 
तस्य जृम्भितविक्षेपाद् व्यामिश्रा वै दिशो दश।
रूपवानिव रुद्रस्य मन्युर्गात्रेष्वदृश्यत॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वह जिस प्रकार दण्ड के द्वारा अपने अंगों को चलाता था, उससे दसों दिशाएँ व्याकुल हो जाती थीं। वह कालरुद्र के अंगों में प्रकट हुए क्रोध के स्वरूप के समान प्रतीत होने लगा था ॥45॥
 
The ten directions got disturbed by the way he operated his body parts with the help of a stick. He started appearing like the embodiment of anger manifested in the limbs of Kalrudra. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)