श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 67: कम्भकर्ण का भयंकर युद्ध और श्रीराम के हाथ से उसका वध  »  श्लोक 165-166
 
 
श्लोक  6.67.165-166 
अथाददे सूर्यमरीचिकल्पं
स ब्रह्मदण्डान्तककालकल्पम्।
अरिष्टमैन्द्रं निशितं सुपुङ्खं
राम: शरं मारुततुल्यवेगम्॥ १६५॥
तं वज्रजाम्बूनदचारुपुङ्खं
प्रदीप्तसूर्यज्वलनप्रकाशम्।
महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगं
राम: प्रचिक्षेप निशाचराय॥ १६६॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद भगवान् श्री रामजी ने ब्रह्माजी के दण्ड के समान भयंकर, तीक्ष्ण तथा काल का संहार करने वाला, जो सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी, इन्द्र के अस्त्र से प्रेरित, शत्रुओं का नाश करने वाला, तेजस्वी सूर्य और प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान, हीरों और सुवर्ण से विभूषित सुन्दर पंखों से युक्त, वायु तथा इन्द्र के वज्र और भस्म के समान वेगवान बाण हाथ में लिया और उस निशाचर प्राणी पर लक्ष्य करके छोड़ दिया॥165-166॥
 
After this, Lord Shri Ram took in his hand an arrow as fierce and sharp as Brahma's rod and destructive time, which was bright like the rays of the sun, inspired by Indra's weapon, destroyer of enemies, resplendent like the bright sun and blazing fire, equipped with beautiful wings adorned with diamonds and gold, as fast as wind and Indra's thunderbolt and ash, and aimed at that nocturnal creature and left it. 165-166॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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