श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 65: कुम्भकर्ण की रणयात्रा  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  6.65.55 
तद् वानरानीकमतिप्रचण्डं
दिशो द्रवद्भिन्नमिवाभ्रजालम्।
स कुम्भकर्ण: समवेक्ष्य हर्षा-
न्ननाद भूयो घनवद्घनाभ:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
बिखरे हुए बादलों के समूह के समान सम्पूर्ण दिशाओं में दौड़ती हुई उस अत्यंत भयंकर वानरों की सेना को देखकर मेघ के समान काला कुम्भकर्ण बड़े हर्ष के साथ भीगी हुई वर्षा की बूँद के समान गम्भीर स्वर में बार-बार गर्जना करने लगा॥55॥
 
Seeing that extremely fierce army of monkeys running in all directions like a group of scattered clouds, Kumbhakarna, who was as black as a cloud, began to roar repeatedly in a deep voice like a wet raindrop with great joy. ॥55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)