श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 63: कुम्भकर्ण का रावण को उसके कुकृत्यों के लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  6.63.30-31 
शृणु राजन्नवहितो मम वाक्यमरिंदम॥ ३०॥
अलं राक्षसराजेन्द्र संतापमुपपद्य ते।
रोषं च सम्परित्यज्य स्वस्थो भवितुमर्हसि॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
शत्रुदमन महाराज! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। राक्षसराज! क्रोध करना व्यर्थ है। अब आप क्रोध त्यागकर स्वस्थ हो जाएँ। ॥30-31॥
 
‘Shatrudaman Maharaj! Listen to me carefully. Demon King! It is useless to be angry. Now you should give up your anger and become healthy. ॥ 30-31॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas