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ramayan 6.62.24: तुम युद्धप्रिय हो और अपने स्वजनों से बहुत प्रेम करते हो। इस समय मेरे लिए यह उत्तम कार्य करो। अपने तेज से शत्रु सेना को उसी प्रकार विचलित करो, जैसे प्रचण्ड वायु शरद ऋतु के बादलों को तितर-बितर कर देती है।॥24॥   |   ramayan सर्ग 6.62: कुम्भकर्ण का रावण के भवन में प्रवेश तथा रावण का राम से भय बताकर उसे शत्रुसेना के विनाश के लिये प्रेरित करना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 62: कुम्भकर्ण का रावण के भवन में प्रवेश तथा रावण का राम से भय बताकर उसे शत्रुसेना के विनाश के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.62.24 
कुरुष्व मे प्रियहितमेतदुत्तमं
यथाप्रियं प्रियरण बान्धवप्रिय।
स्वतेजसा व्यथय सपत्नवाहिनीं
शरद्घनं पवन इवोद्यतो महान्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
तुम युद्धप्रिय हो और अपने स्वजनों से बहुत प्रेम करते हो। इस समय मेरे लिए यह उत्तम कार्य करो। अपने तेज से शत्रु सेना को उसी प्रकार विचलित करो, जैसे प्रचण्ड वायु शरद ऋतु के बादलों को तितर-बितर कर देती है।॥24॥
 
‘You are a lover of war and you love your relatives a lot. At this time, do this best for me. Disturb the enemy army with your brilliance, just like a strong wind scatters the clouds of autumn.’॥ 24॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विषष्टितम: सर्ग: ॥ ६ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ २॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)