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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 62: कुम्भकर्ण का रावण के भवन में प्रवेश तथा रावण का राम से भय बताकर उसे शत्रुसेना के विनाश के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  6.62.21-22 
त्वय्यस्ति मम च स्नेह: परा सम्भावना च मे।
देवासुरेषु युद्धेषु बहुशो राक्षसर्षभ॥ २१॥
त्वया देवा: प्रतिव्यूह्य निर्जिताश्चासुरा युधि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'मुझे आपसे बहुत स्नेह है और आपसे बड़ी आशाएँ हैं। हे दैत्यराज! देव-असुर युद्ध के अवसरों पर आपने अनेक बार प्रतिद्वन्द्वी का रूप धारण करके देवताओं और असुरों को युद्धभूमि में परास्त किया है।
 
‘I have great affection for you and I have great expectations from you. O king of demons! On occasions of Devas-Asuras war, you have taken the position of an opponent many times and defeated the Gods and Asuras on the battlefield.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)