श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 61: विभीषण का श्रीराम को कुम्भकर्ण का परिचय देना, श्रीराम की आज्ञा से वानरों का लङ्का के द्वारों पर डट जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  6.61.20 
प्रजानां भक्षणं चापि देवानां चापि धर्षणम्।
आश्रमध्वंसनं चापि परस्त्रीहरणं भृशम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इसमें लोगों के भक्षण, देवताओं के अपमान, ऋषियों के आश्रमों के विनाश और अन्य स्त्रियों के बार-बार अपहरण की भी बात कही गई है।
 
It also tells of the devouring of people, the humiliation of the gods, the destruction of the ashrams of sages and the repeated abduction of other's women.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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