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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 58: नील के द्वारा प्रहस्त का वध  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  6.58.41-42 
तस्य बाणगणानेव राक्षसस्य दुरात्मन:।
अपारयन् वारयितुं प्रत्यगृह्णान्निमीलित:।
यथैव गोवृषो वर्षं शारदं शीघ्रमागतम्॥ ४१॥
एवमेव प्रहस्तस्य शरवर्षान् दुरासदान्।
निमीलिताक्ष: सहसा नील: सेहे दुरासदान्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
उस दुष्टात्मा राक्षस के बाणों की वर्षा को रोक पाने में असमर्थ नील ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उन बाणों को अपने शरीर पर ग्रहण करने लगा। जिस प्रकार बैल शरद ऋतु की अचानक होने वाली वर्षा को चुपचाप अपने शरीर पर सहन कर लेता है, उसी प्रकार नील ने आँखें बंद करके प्रहस्त के बाणों की उस असहनीय वर्षा को चुपचाप सहन किया।
 
Unable to ward off the shower of arrows of that evil-minded demon, Neel closed his eyes and began to receive all those arrows on his body. Just as a bull quietly bears the sudden rain of autumn on its body, in the same way Neel quietly endured that unbearable shower of arrows from Prahasta with his eyes closed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)