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ramayan 6.51.15-16: (वह मन ही मन सोचने लगा-) 'यदि मेरे वे दोनों शत्रु, जो विषधर सर्पों के समान भयंकर थे, जिन्हें वरदान प्राप्त था, जो अच्युत थे और जिनका तेज सूर्य के समान था, युद्धभूमि में इन्द्रजित् द्वारा बाँधे जाने पर भी बच निकलने में सफल हो गए, तो मैं अपनी समस्त सेना को ही संदेह में डालने की कल्पना कर सकता हूँ॥ 15-16॥   |   ramayan सर्ग 6.51: श्रीराम के बन्धनमुक्त होने का पता पाकर चिन्तित हए रावण का धूम्राक्ष को युद्ध के लिये भेजना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 51: श्रीराम के बन्धनमुक्त होने का पता पाकर चिन्तित हए रावण का धूम्राक्ष को युद्ध के लिये भेजना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  6.51.15-16 
घोरैर्दत्तवरैर्बद्धौ शरैराशीविषोपमै:।
अमोघै: सूर्यसंकाशै: प्रमथ्येन्द्रजिता युधि॥ १५॥
तदस्त्रबन्धमासाद्य यदि मुक्तौ रिपू मम।
संशयस्थमिदं सर्वमनुपश्याम्यहं बलम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
(वह मन ही मन सोचने लगा-) 'यदि मेरे वे दोनों शत्रु, जो विषधर सर्पों के समान भयंकर थे, जिन्हें वरदान प्राप्त था, जो अच्युत थे और जिनका तेज सूर्य के समान था, युद्धभूमि में इन्द्रजित् द्वारा बाँधे जाने पर भी बच निकलने में सफल हो गए, तो मैं अपनी समस्त सेना को ही संदेह में डालने की कल्पना कर सकता हूँ॥ 15-16॥
 
(He started thinking to himself-) 'If those two enemies of mine, who were as dreadful as poisonous snakes, who had received boons and were infallible and whose brilliance was like that of the Sun, were bound by Indrajit on the battlefield and yet managed to escape from it, then I can only imagine my entire army to be in doubt.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)