श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 50: विभीषण को इन्द्रजित समझकर वानरों का पलायन, गरुड़ का आना और श्रीराम लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करके जाना  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक  6.50.59-60 
इत्येवमुक्त्वा वचनं सुपर्ण: शीघ्रविक्रम:।
रामं च नीरुजं कृत्वा मध्ये तेषां वनौकसाम्॥ ५९॥
प्रदक्षिणं तत: कृत्वा परिष्वज्य च वीर्यवान्।
जगामाकाशमाविश्य सुपर्ण: पवनो यथा॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर वेगशाली और बलवान गरुड़जी ने श्री रामजी को रोगमुक्त करके वानरों के बीच से उनकी परिक्रमा की और उन्हें गले लगाकर वायु के समान वेग से आकाश में चले गए ॥59-60॥
 
Having said these words, the swift and powerful Garuda, having cured Sri Rama, circled around him amidst the monkeys and, embracing him, went into the sky as fast as the wind. ॥ 59-60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)