श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 50: विभीषण को इन्द्रजित समझकर वानरों का पलायन, गरुड़ का आना और श्रीराम लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करके जाना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  6.50.52 
मोक्षितौ च महाघोरादस्मात् सायकबन्धनात्।
अप्रमादश्च कर्तव्यो युवाभ्यां नित्यमेव हि॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
मैंने आकर तुम दोनों को इस बाणों के भयंकर बंधन से मुक्त कर दिया है। अब तुम सदैव सावधान रहो। 52.
 
I came and freed you both from this dreadful bondage of arrows. Now you must always be cautious. 52.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)