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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 46: श्रीराम और लक्ष्मण को मूर्च्छित देख वानरों का शोक, इन्द्रजित का पिता को शत्रुवध का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  6.46.30-31h 
तमुवाच परित्रस्तं वानरेन्द्रं विभीषण:।
सबाष्पवदनं दीनं शोकव्याकुललोचनम्॥ ३०॥
अलं त्रासेन सुग्रीव बाष्पवेगो निगृह्यताम्।
 
 
अनुवाद
उनके मुख पर विनम्रता छा गई, आँसू बहने लगे और उनकी आँखें शोक से व्याकुल हो गईं। उस समय विभीषण ने अत्यंत भयभीत वानरराज से कहा - 'सुग्रीव! डरो मत। डरने से कोई लाभ नहीं है। आँसुओं का यह प्रवाह बंद करो।'
 
A look of humility spread on his face, tears started flowing and his eyes became restless with grief. At that time, Vibhishan said to the very frightened monkey king - 'Sugreeva! Do not be afraid. There is no use in being afraid. Stop this flow of tears.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)