श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 45: इन्द्रजित के बाणों से श्रीराम और लक्ष्मण का अचेत होना और वानरों का शोक करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.45.25 
बाणपातान्तरे रामं पतितं पुरुषर्षभम्।
स तत्र लक्ष्मणो दृष्ट्वा निराशो जीवितेऽभवत्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
महापुरुष श्री रामजी को अपने से उतनी ही दूरी पर भूमि पर लेटे हुए देखकर, जितनी दूरी पर छोड़ा हुआ बाण गिरता है, लक्ष्मण अपने जीवन से निराश हो गए॥ 25॥
 
Seeing the great man Sri Ram lying on the ground at the same distance from him as the distance at which a thrown arrow falls, Lakshmana despaired of his life.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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