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श्लोक 6.45.11  |
युध्यमानमनालक्ष्यं शक्रोऽपि त्रिदशेश्वर:।
द्रष्टुमासादितुं वापि न शक्त: किं पुनर्युवाम्॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| युद्ध के समय जब मैं अदृश्य हो जाता हूँ, तब देवराज इन्द्र भी मुझे देख या पा नहीं सकते; फिर तुम दोनों क्या कर सकते हो?॥11॥ |
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| Even Devraj Indra cannot see or find me when I become invisible during a war; then what can you two do?॥ 11॥ |
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