श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 45: इन्द्रजित के बाणों से श्रीराम और लक्ष्मण का अचेत होना और वानरों का शोक करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  6.45.11 
युध्यमानमनालक्ष्यं शक्रोऽपि त्रिदशेश्वर:।
द्रष्टुमासादितुं वापि न शक्त: किं पुनर्युवाम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
युद्ध के समय जब मैं अदृश्य हो जाता हूँ, तब देवराज इन्द्र भी मुझे देख या पा नहीं सकते; फिर तुम दोनों क्या कर सकते हो?॥11॥
 
Even Devraj Indra cannot see or find me when I become invisible during a war; then what can you two do?॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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