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ramayan 6.43.2-3: वे वीर राक्षस स्वर्ण-आभूषणों से सुसज्जित, घोड़ों और हाथियों पर सवार, अग्नि की ज्वाला के समान चमकते रथों और सूर्य के समान तेजस्वी कवचों से युक्त होकर दसों दिशाओं में गर्जना करते हुए निकल पड़े। वे सभी रात्रिचर प्राणी भयंकर कर्म करते हुए रावण की विजय चाहते थे।   |   ramayan सर्ग 6.43: द्वन्द्वयुद्ध में वानरों द्वारा राक्षसों की पराजय   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 43: द्वन्द्वयुद्ध में वानरों द्वारा राक्षसों की पराजय  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  6.43.2-3 
ते हयै: काञ्चनापीडैर्गजैश्चाग्निशिखोपमै:।
रथैश्चादित्यसंकाशै: कवचैश्च मनोरमै:॥ २॥
निर्ययू राक्षसा वीरा नादयन्तो दिशो दश।
राक्षसा भीमकर्माणो रावणस्य जयैषिण:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वे वीर राक्षस स्वर्ण-आभूषणों से सुसज्जित, घोड़ों और हाथियों पर सवार, अग्नि की ज्वाला के समान चमकते रथों और सूर्य के समान तेजस्वी कवचों से युक्त होकर दसों दिशाओं में गर्जना करते हुए निकल पड़े। वे सभी रात्रिचर प्राणी भयंकर कर्म करते हुए रावण की विजय चाहते थे।
 
Those valiant demons, decked with golden ornaments, riding horses and elephants, chariots shining like the flames of fire and having beautiful armour as dazzling as the sun, came out roaring in all the ten directions. All those nocturnal creatures, performing horrific deeds, wanted Ravana's victory.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)