श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 42: लङ्का पर वानरों की चढ़ाई तथा राक्षसों के साथ उनका घोर युद्ध  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.42.8 
अत्र सा मृगशावाक्षी मत्कृते जनकात्मजा।
पीडॺते शोकसंतप्ता कृशा स्थण्डिलशायिनी॥ ८॥
 
 
अनुवाद
"हाय! वह मृग-शावक-सी आँखों वाली जनकनन्दिनी सीता यहाँ मेरे लिए दुःखी होकर पृथ्वी पर वेदी पर सो रही है। मैं सुनता हूँ कि वह बहुत दुर्बल हो गई है।"
 
Alas! That deer-cub-eyed Janakanandini Sita is suffering from grief for me here and is sleeping on the altar on the earth. I hear that she has become very weak.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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