श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 42: लङ्का पर वानरों की चढ़ाई तथा राक्षसों के साथ उनका घोर युद्ध  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  6.42.39-40 
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोष: सिंहनादस्तरस्विनाम्।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरं चाभ्यनादयत्॥ ३९॥
गजानां बृंहितै: सार्धं हयानां ह्रेषितैरपि।
रथानां नेमिनिर्घोषै रक्षसां वदनस्वनै:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट, रथ के पहियों की घरघराहट और राक्षसों के मुख से निकलने वाली ध्वनियाँ, शंख और दुन्दुभियों की ध्वनियाँ और वेगवान वानरों के कोलाहल से पृथ्वी, आकाश और समुद्र में कोलाहल मच गया ॥39-40॥
 
In this way, the earth, the sky and the sea became noisy with the cries of elephants, the neighing of horses, the whirring of chariot wheels and the sounds that came from the mouths of demons, as well as the sounds of conch shells and dundubhis and the noise of fast monkeys. 39-40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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