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ramayan 6.41.93: इधर, श्री रामचन्द्रजी हर्ष से गर्जना करते हुए, बहुत से वानरों से घिरे हुए, युद्ध के लिए डटे हुए थे। वे अपने शत्रु का वध करना चाहते थे।   |   ramayan सर्ग 6.41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  6.41.93 
रामस्तु बहुभिर्हृष्टैर्विनदद्भि: प्लवङ्गमै:।
वृतो रिपुवधाकाङ्क्षी युद्धायैवाभ्यवर्तत॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
इधर, श्री रामचन्द्रजी हर्ष से गर्जना करते हुए, बहुत से वानरों से घिरे हुए, युद्ध के लिए डटे हुए थे। वे अपने शत्रु का वध करना चाहते थे।
 
Here, roaring with joy, Shri Ramchandraji, surrounded by a large number of monkeys, stood firm for the battle. He wanted to kill his enemy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)