Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 6.41.71: "हे रात्रिचर जीव! मेरी दृष्टि में आकर यदि तुम पक्षी बनकर उड़कर तीनों लोकों में छिप भी जाओ, तो भी जीवित अपने घर नहीं लौट सकोगे। 71.   |   ramayan सर्ग 6.41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  6.41.71 
यद्याविशसि लोकांस्त्रीन् पक्षीभूतो निशाचर।
मम चक्षु:पथं प्राप्य न जीवन् प्रतियास्यसि॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
"हे रात्रिचर जीव! मेरी दृष्टि में आकर यदि तुम पक्षी बनकर उड़कर तीनों लोकों में छिप भी जाओ, तो भी जीवित अपने घर नहीं लौट सकोगे। 71.
 
"O nocturnal creature! After coming in my sight, even if you become a bird and fly and hide in the three worlds, you will not be able to return to your home alive. 71.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)