श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  6.41.68 
धर्मात्मा राक्षसश्रेष्ठ: सम्प्राप्तोऽयं विभीषण:।
लङ्कैश्वर्यमिदं श्रीमान् ध्रुवं प्राप्नोत्यकण्टकम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
ये दानवों में श्रेष्ठ भगवान विभीषण भी मेरे साथ यहाँ आये हैं, निश्चय ही इन्हें ही लंका का निष्कंटक राज्य मिलेगा ॥68॥
 
“This noble Lord Vibhishan, the best among the demons, has also come here with me, surely only he will get the uninterrupted kingdom of Lanka.” 68॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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