श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  6.41.64 
यस्य दण्डधरस्तेऽहं दाराहरणकर्शित:।
दण्डं धारयमाणस्तु लङ्काद्वारे व्यवस्थित:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
मैं अपराधियों को दण्ड देने वाला शासक हूँ। तुमने मेरी पत्नी का अपहरण किया है, जिससे मुझे बहुत दुःख हुआ है; इसलिए मैं तुम्हें दण्ड देने के लिए लंका के द्वार पर आकर खड़ा हुआ हूँ।
 
"I am a ruler who punishes criminals. You have abducted my wife, which has caused me great pain; therefore, I have come and stood at the gates of Lanka to punish you for that. 64.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas