श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 62-63
 
 
श्लोक  6.41.62-63 
ऋषीणां देवतानां च गन्धर्वाप्सरसां तथा।
नागानामथ यक्षाणां राज्ञां च रजनीचर॥ ६२॥
यच्च पापं कृतं मोहादवलिप्तेन राक्षस।
नूनं ते विगतो दर्प: स्वयंभूवरदानज:।
तस्य पापस्य सम्प्राप्ता व्युष्टिरद्य दुरासदा॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
"निश्चर! हे दैत्यराज! तुमने मोहवश अहंकार करके ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, यक्षों और राजाओं के प्रति महान अपराध किया है। ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करके तुमने जो अभिमान उत्पन्न किया था, उसे नष्ट करने का समय आ गया है। तुम्हारे पाप का असह्य फल आज उपस्थित है।" 62-63
 
"Nishchar! O demon king! You have committed a great crime against the sages, gods, Gandharvas, Apsaras, serpents, Yakshas and kings by becoming arrogant due to infatuation. The time has come to destroy the pride you had developed after receiving the boon from Lord Brahma. The unbearable result of your sin is present today. 62-63.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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