श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 6-8h
 
 
श्लोक  6.41.6-8h 
त्वयि चानागते पूर्वमिति मे निश्चिता मति:।
जानतश्चापि ते वीर्यं महेन्द्रवरुणोपम॥ ६॥
हत्वाहं रावणं युद्धे सपुत्रबलवाहनम्।
अभिषिच्य च लङ्कायां विभीषणमथापि च॥ ७॥
भरते राज्यमारोप्य त्यक्ष्ये देहं महाबल।
 
 
अनुवाद
हे महेन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी! यद्यपि मैं आपके बल और पराक्रम को जानता था, तथापि आपके यहाँ आने से पूर्व ही मैंने यह निश्चय कर लिया था कि युद्ध में रावण को उसके पुत्र, सेना और वाहनों सहित मारकर विभीषण को लंका का राजा अभिषिक्त करूँगा और भरत को अयोध्या का राज्य देकर इस शरीर का त्याग करूँगा।॥6-7 1/2॥
 
O mighty one like Mahendra and Varuna! Although I knew about your strength and valour, yet before you came back here, I had decided that after killing Ravana along with his son, army and vehicles in the war, I will anoint Vibhishana as the king of Lanka and after giving the kingdom of Ayodhya to Bharat, I will give up this body.' ॥ 6-7 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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