श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  6.41.55 
महाञ्छब्दोऽभवत् तत्र बलौघस्याभिवर्तत:।
सागरस्येव भिन्नस्य यथा स्यात् सलिलस्वन:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जैसे समुद्र का जल किसी सेतु को तोड़कर अथवा अपनी सीमा को तोड़कर जोर से शब्द करता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करती हुई विशाल वानर सेना जोर से शब्द कर रही थी ॥55॥
 
Just as the water of the ocean breaking through a bridge or breaking its limits makes a loud noise, similarly, the huge monkey army attacking there was making a loud noise. ॥55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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