श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  6.41.54 
राक्षसा विस्मयं जग्मु: सहसाभिनिपीडिता:।
वानरैर्मेघसंकाशै: शक्रतुल्यपराक्रमै:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
मेघ के समान काले, भयंकर तथा इन्द्र के समान पराक्रमी वानरों द्वारा सहसा पीड़ित किये जाने पर राक्षसगण अत्यन्त विस्मित हो गये ॥54॥
 
The demons were very astonished at being suddenly tormented by the monkeys who were as black and fearsome as clouds and as powerful as Indra. ॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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