vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 6: युद्ध काण्ड
»
सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय
»
श्लोक 54
श्लोक
6.41.54
राक्षसा विस्मयं जग्मु: सहसाभिनिपीडिता:।
वानरैर्मेघसंकाशै: शक्रतुल्यपराक्रमै:॥ ५४॥
अनुवाद
मेघ के समान काले, भयंकर तथा इन्द्र के समान पराक्रमी वानरों द्वारा सहसा पीड़ित किये जाने पर राक्षसगण अत्यन्त विस्मित हो गये ॥54॥
The demons were very astonished at being suddenly tormented by the monkeys who were as black and fearsome as clouds and as powerful as Indra. ॥ 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×