श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  6.41.50 
परिपूर्णमिवाकाशं सम्पूर्णेव च मेदिनी।
लङ्कामुपनिविष्टैश्च सम्पतद्भिश्च वानरै:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
लंका में उछलते-कूदते वानरों से आकाश भर गया था और पुरी में खड़े हुए वानरों के समूहों से सारी पृथ्वी आच्छादित हो गई थी ॥50॥
 
The sky was filled with the monkeys jumping in Lanka and the entire earth was covered with the groups of apes standing in Puri. ॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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