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श्लोक 6.41.50  |
परिपूर्णमिवाकाशं सम्पूर्णेव च मेदिनी।
लङ्कामुपनिविष्टैश्च सम्पतद्भिश्च वानरै:॥ ५०॥ |
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| अनुवाद |
| लंका में उछलते-कूदते वानरों से आकाश भर गया था और पुरी में खड़े हुए वानरों के समूहों से सारी पृथ्वी आच्छादित हो गई थी ॥50॥ |
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| The sky was filled with the monkeys jumping in Lanka and the entire earth was covered with the groups of apes standing in Puri. ॥ 50॥ |
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