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ramayan 6.41.33: लंका का उत्तरी द्वार पर्वत शिखर जितना ऊँचा था। राम और लक्ष्मण ने अपने धनुष लेकर उसका मार्ग रोक लिया और अपनी सेना की रक्षा के लिए वहीं रुक गए।   |   ramayan सर्ग 6.41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.41.33 
लङ्कायास्तूत्तरद्वारं शैलशृङ्गमिवोन्नतम्।
राम: सहानुजो धन्वी जुगोप च रुरोध च॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
लंका का उत्तरी द्वार पर्वत शिखर जितना ऊँचा था। राम और लक्ष्मण ने अपने धनुष लेकर उसका मार्ग रोक लिया और अपनी सेना की रक्षा के लिए वहीं रुक गए।
 
The northern gate of Lanka was as high as a mountain peak. Rama and Lakshmana blocked its path with their bows in their hands and stayed there to protect their army.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)