श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम का सुग्रीव को दुःसाहस से रोकना, लङ्का के चारों द्वारों पर वानरसैनिकों की नियक्ति, रामदत अङद का रावण के महल में पराक्रम तथा वानरों के आक्रमण से राक्षसों को भय  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.41.15 
रक्तचन्दनसंकाशा संध्या परमदारुणा।
ज्वलच्च निपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘घोर संध्या रक्त-चन्दन के समान लाल दिखाई दे रही है। सूर्य से प्रज्वलित अग्नि का एक पुंज गिर रहा है।॥15॥
 
‘The intense dusk appears as red as blood-sandalwood. A mass of blazing fire is falling from the sun.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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