श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 37: विभीषण का श्रीराम से लङ्का की रक्षा के प्रबन्ध का वर्णन तथा श्रीराम द्वारा लङ्का के विभिन्न द्वारों पर आक्रमण करने के लिये अपने सेनापतियों की नियुक्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.37.17 
विक्रान्ता बलवन्तश्च संयुगेष्वाततायिन:।
इष्टा राक्षसराजस्य नित्यमेते निशाचरा:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वे सभी बड़े वीर, पराक्रमी और युद्ध में अत्याचारी हैं। ये सभी निशाचर राक्षस राजा रावण को सदैव प्रिय हैं॥17॥
 
‘They are all very brave, powerful and tyrannical in war. All these nocturnal demons are always dear to King Ravana.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)