श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 37: विभीषण का श्रीराम से लङ्का की रक्षा के प्रबन्ध का वर्णन तथा श्रीराम द्वारा लङ्का के विभिन्न द्वारों पर आक्रमण करने के लिये अपने सेनापतियों की नियुक्ति  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  6.37.12-13 
राक्षसानां सहस्रैस्तु बहुभि: शस्त्रपाणिभि:॥ १२॥
युक्त: परमसंविग्नो राक्षसै: सह मन्त्रवित्।
उत्तरं नगरद्वारं रावण: स्वयमास्थित:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘स्वयं मन्त्रज्ञ रावण, शुक, सारण आदि सहस्रों शस्त्रधारी राक्षसों के साथ नगर के उत्तरी द्वार पर सावधानी से खड़ा है। वह मन में अत्यन्त व्याकुल प्रतीत होता है।॥12-13॥
 
‘Ravana, who is himself an expert in mantras, is standing cautiously at the northern gate of the city along with thousands of armed demons like Shuka, Saran etc. He seems to be very agitated in his mind.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)