श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 35: माल्यवान् का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  6.35.4-5 
तरणं सागरस्यास्य विक्रमं बलपौरुषम्॥ ४॥
यदुक्तवन्तो रामस्य भवन्तस्तन्मया श्रुतम्।
भवतश्चाप्यहं वेद्मि युद्धे सत्यपराक्रमान्।
तूष्णीकानीक्षतोऽन्योन्यं विदित्वा रामविक्रमम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तुमने राम के पराक्रम, बल और समुद्र लांघने के विषय में जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुना है; परंतु तुम लोगों को भी, जो अब राम के पराक्रम को जानकर चुपचाप एक दूसरे का मुख देख रहे हो, मैं युद्धभूमि में सच्चे वीर योद्धा मानता हूँ।॥4-5॥
 
I have heard all that you have told about Rama's valour, his strength and his crossing of the ocean; but I consider even you, who are now silently looking at each other's faces after knowing about Rama's valour, to be truly valiant warriors on the battlefield.'॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)