श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 35: माल्यवान् का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.35.22 
तेषु तेषु च देशेषु पुण्येष्वेव दृढव्रतै:।
चर्यमाणं तपस्तीव्रं संतापयति राक्षसान्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘विभिन्न देशों में पुण्यकर्मों में तत्पर रहने वाले तथा उत्तम व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले ऋषियों द्वारा किया गया घोर तप, राक्षसों को कष्ट दे रहा है ॥22॥
 
‘In different countries, the intense penance performed by the sages who remain engaged in virtuous deeds and firmly follow the best fasts, is troubling the demons. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)